का करबऽ मंत्री जी : चकाचक बनारसी

Chakachak Banarasiचेत गइल जनता त बोलऽ हे मंत्री जी फिर का करबऽ ।

दरे दरे गोड़ धरिया कइलऽ दाँत निपोरत रहलऽ मालिक,
भिखमंगई, चन्दा व्यौरा पर सच्चा जीयत रहलऽ मालिक,
कांगरेसी तू रहलऽ नाहीं झटके में बन गइलऽ मालिक,
बाप दादा भीख मंगलन, तू एम०एल०ए० हो गइलऽ मालिक,
कुर्सी निकल गइल त बोलऽ फिर केकर तू चीलम भरबऽ ॥१॥

सत्ता में अउतै तू मालिक दिव्य डुबइलऽ देश कऽ लोटिया,
दरे दरे उदघाटन कइलऽ पेड़ लगउलऽ रखलऽ पटिया,
घूसो लेहलऽ टैक्स बढ़इलऽ सबै काम तू कइलऽ घटिया,
आज देश कंगाल हो गयल, कइलऽ खड़ी देश कऽ खटिया,
खूँटा में बँधलेस जनता त कइसे खेत देस क चरबऽ ॥।२॥

पाँच बरस अस्वासस्न छोड़ के जनता के कुछ देहलऽ नाहीं,
अउर तू का देतऽ जनता के रासन तक त देहलऽ नाहीं,
सेतै देहलऽ परमिट, कोटा, लाइसेंस का लेहलऽ नाहीं ?
सच बोले का खानदान के सरकारी पद देहलऽ नाहीं ?
यदि हिसाब लेहलेस जनता त फिर केकर सोहरइबऽ धरबऽ ॥३॥

वादा पर वादा कइलऽ पर वादा पूरा कइलऽ नाहीं,
बेइमानन क साथ निभइलऽ बेइमानन के धइलऽ नाहीं,
हौ सेवा करतब हमार का भाषन में तू कहलऽ नाहीं ?
बोलऽ बे मतलब तू का दौरा पर दौरा कइलऽ नाहीं ?
मर के तू शैतानै होबऽ मरले पर तू नाहीं मरबऽ ॥४॥

जनता के भूखा मरलऽ पर हचक हचक के खइलऽ सच्चा,
कभी बाजरा कांड, कभी लाइसेंस कांड तू कइलऽ सच्चा,
तू चुनाव के जीतै खातिर तस्करवन के धइलऽ सच्चा,
सबके धर के लोकतंत्र खतरे में हौ समझउलऽ सच्चा,
सोझे संसद भंग न होई सोझे तू सब नाहीं टरबऽ ॥५॥

सोचत होबऽ अपने मन में की सब जूता नाप क हउवै,
सोचत होबऽ अपने मन में की मंत्री पद टाप क हउवै,
तनिको नाहीं सोचत होबऽ की ई कुल धन पाप क हउवै,
छोड़तऽ काहे नाहीं कुर्सी का ऊ तोहरे बाप क हउवै,
कइले चालऽ पाप एकजाई यही जनम में सब कुछ भरबऽ ॥६॥

सब कुछ छोड़बऽ सीधे-सीधे तोप चली न चली तमंचा,
जाग रहल हौ देस चकाचक रोजै होई खमची खमचा,
गिनवाई जौने दिन जनता दिव्य लगइबऽ ओ दिन खोमचा,
निश्चित भुक्खन मर जइहैं ओ दिन तोहार कुल चमची चमचा,
पाँच बरस तू रह गइलऽ त अबकी मालिक देश के गरबऽ ॥७॥

---चकाचक बनारसी

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सबसे सुघर मोर गाँव रे..

परसत धरनि सरस सोहराइल सघन रसाल की  छाँव रे
कोकिल कीर मधुर सुर कूँजत कागा करै काँव-काँव रे ।
तँह विधुबदनी बइसि बतियावैं टेरि परसपर नाँव रे
सरगो के सखि ललचावै सलोना सबसे सुघर मोर गाँव रे ॥


अलिदल नलिनीं झुलावैं री आली निरखु तलइया ।
घनि बँसवरिया में पुरुबी बयरिया
रसे रसे बँसुरी बजावै री आली, निरखु तलइया ।
सर बर तरुनी नयन दुइ मछरी
कमल कै हथवा हिलावैं री आली, निरखु तलइया ।
मोजरल अमवा पियरि सरसोइया
फुलल परसवा बोलावै री आली, निरखु तलइया ।
अलिदल नलिनीं झुलावैं री आली निरखु तलइया


मोरी सहेलिया रे,
गउवैं खातिर छछनै मोर परान मोरी सहेलिया रे ।

खरी जिउतिया भुखैं मतरिया,
ननदो करैं ओसार अगोरिया – मोरी सहेलिया रे
पंडित भोरे भरैं भैरवीतान, मोरी सहेलिया रे -
गउवैं खातिर छछनै मोर परान मोरी सहेलिया रे ।

नाउन धोबिन धनि मलिहोरी,
पावैं पहुरा खोरिन खोरी – मोरी सहेलिया रे
स्वाती चितरा लहरैं गोइड़ै धान, मोरी सहेलिया रे -
गउवैं खातिर छछनै मोर परान मोरी सहेलिया रे ।

कतहूँ बरगद तर चौपाला,
कतहूँ बजै ढोल पर आल्हा - मोरी सहेलिया रे
कतहूँ बिरहा गावैं ग्वाला रेखभिनान, मोरी सहेलिया रे -
गउवैं खातिर छछनै मोर परान मोरी सहेलिया रे ।


जुग-जुग जीयै सखी मोर गउवाँ ।

कचरस सोन्ह करहवा कै खुरचन
लिटका लटीयै सखी मोर गउवाँ -
जुग-जुग जीयै सखी मोर गऊवाँ ।

बुढ़-ठेल तिरिया ओसरिया में ओठघल
लेवन सीयैं सखी मोर गउवाँ -
जुग-जुग जीयै सखी मोर गऊवाँ ।


गउवाँ इन्नर की रजधानी अखियाँ लखि ललचानी ना ।

दादुर मोर पपीहरा बोलै ओनवल घटा सुहानी ना
मड़इन लतर ललित अरुझानी, अखियाँ लखि ललचानी ना ।

सम्मय, बरम्ह, दइतरा, काली, भैरव की डिहवानी ना
माई सुघर मनौती मानी अखियाँ लखि ललचानी ना ।

ओक्का-बोक्का तीन तलौका, ’पंकिल’ गढ़ैं कहानी ना
सोहर गावैं धिया चुल्हानी, अँखिया लखि ललचानी ना ।

कमलवा गुलबवा कै बतिया..

दुइ सखि बिहँसि करैंलीं पनघटवा पै अपने कमलवा गुलबवा कै बतिया ।

एक लखि ललचै कमल फुल तलवा में, दूजी गुलबवा लगावैले छतिया ॥

 

 

पहली सखी -

कमल मोरे पिछुअरिया सघन बँसवरिया तहवाँ कँवल-दह ताल

ताहि बिचे रँग-रँग खिलल कमल सखि कवनो धवल कवनो लाल ।

दखिन  बयरिया से रसे रसे लहरैले हरियर हरियर लाल

लेहले पँखुरिया की नरमी अँगुरिया में सुरुजू के पुजवा कै थाल ॥

 

 

दूसरी सखी -

नियरे सटल मलहोरिया क बगिया तह सखि खिलल गुलाब

घुमरि घुमरि तँह बवरा भँवरवा गुन-गुन गावै ला बिहाग ।

जुड़ै रहैं मलिया क धियनी पुतनिया कै जुग-जुग अचल सोहाग

दस दिशि गम-गम गमकै गुलबवा से धरती  कै सखि अहोभाग ॥

 

 

पहली सखि -

सखि  सब मोर देवता कमल नयना ।

 

नीरज-नयनी पदुम गंदी गोरिया

सखि मनभावन के भरि अंकवारिया

आली रसे-रसे बोलै मधुर बयना ..

सखि सब मोर देवता कमल नयना ।

 

ना कंटवा भय ना पसीनवान सिंचाई

ललके कमल पर लसै लक्ष्मी माई

दुलरावैं  सखि भँवरा सुगन मयना ..

सब मोर देवता कमल नयना ।

 

दूसरी सखि -

सखि  गमला गुलबवा गज़ब गमकै ।

 

चोलवा गुलाबी कपोलवा गुलाबी

मनवा गुलाबी भवनवां गुलाबी

सखि नयना गुलाबी सी मद छलकै ..

सखि गमला गुलाबवा गज़ब गमकै ।

 

बासल गुलबवा से सँवरू कै पगिया

इतर गुलाबी घँसल मोरि अँगिया

सखि जोगियो कै मनवाँ निबुकि बहकै ..

सखि गमला गुलबवा गजब गमकै ।

 

 

पहली सखि -

चाकर-चाकर आली पुरइन  पात रे ।

 

भावै भँवरवा के नलिनी कै कोरवा

कमल कै डरिया नरम धइले ठोरवा

हंसा गगनवाँ में उड़ि-उड़ि जात रे ..

चाकर-चाकर आली पुरइन पात रे ।

 

जलवै में जामै जलै में खोलै पँखिया

ओहि पाँकी पनियैं में मूदि लेला अँखिया

तबहूँ न ’पंकिल’ होखै ला गात रे ..

चाकर-चाकर आली पुरइन पात रे ।

 

 

दोनों सखियाँ -

आवा गाईं जा दूनों फुलवन कै गीत आली ।

 

कमलो कै गीत आली,  गुलबो के गीत आली

दूनो फूलन ’पंकिल’ धरती कै मीत आली

आवा गाईं जा दूनों फुलवन कै गीत आली ।

धोबी-धोबिन क बतकही..(क्रियात्मक गीत)

गँवई तलइया में बस्तर धोवै जात की बेरियाँ धोबी-धोबिनी आपन हियरे क मरम एक दुसरे से बतियाव तारन ! लुगाई गरीबी क रोवना रोव तिया तऽ मनसेधू ओकरा के गवें-गवें ढाढस दे तारन, समझावत-बुझावत बाड़न । इहै आपसी पति-पत्नी संवाद चल रहल बा -


धोबिन- रहि-रहि जियरा कचोटै ला हे पियऊ हम दाना-दाना के मोहाल ।
सऊँसै जहनवाँ में सजना बताय देता, हमरो से बड़ के कँगाल ?

धोबी- जिय दुख जनि माना धनि बउरहिया, बिरथा करैलू अफसोस ।
उहै मोर तिरिया निपट भिखमँगवा जेकरे हिय न संतोष ॥

धोबिन- के मोर पिया हो अकसवो से ऊपर भुईंया से के गरुआय ?
जियते जियत के मुअल माटिलौना तनि देता बलमू बताय ?

धोबी- बाबू रे बहुरिया अकसवो से ऊपर भुईंया से गरुइल माय ।
जियते जियत उन्हैं मूअल तू बूझिहा, कमवाँ से जे कदराय ॥

धोबिन- अमिरित-अमिरित सुनीला सजनवाँ, अमिरित कहवाँ भेंटाय ?
सरग नरक कहाँ कवन डगरिया तहवाँ सजन लेइ जाय ?

धोबी- तृषना कै नाश सरग मोरि सजनी अमिरित नेहिया सोहाय ।
घोर नरक इहै देहियाँ  रे तिरिया नारी नरक लेइ जाय ॥

धोबिन- के बड़ अन्हरा कवन बड़ गुँगवा के दुशमनवाँ क खान ?
मुअलो से बड़ का बतावा ए करेजऊ, का जग मरन समान ?

धोबी- कामी अन्ध, गुँगवा समय अनबोलता, मन दुशमनवाँ क खान ।
मुअलो से बड़ अपजस मोरि रनियाँ माँगन मरन समान ॥

धोबिन- दीरघ रोग कवन जग रजऊ कवन अगिनियाँ अपार ?
कवन गहनवाँ पहिरि झमकवलै हरियर होखै ला सिंगार ?

धोबी- दीरघ रोग ई दुनियैं बहुरिया चिन्ता अगिनियाँ अपार ।
शील गहनवाँ पहिरि अँग ’पंकिल’ जिनगी कै निखरै सिंगार ।

कइसे बसंत मनाइब हो ..

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सखि आइल मधुऋतु आइल खुशिया छिटाइल हो
आली कंत न अइलैं तै कइसे बसंत मनाइब हो ॥

बैरिनि कुहुँकै कोइलिया कतेक समुझाइब हो
सखि बगिया निरखि रसवंती पगल होइ जाइब हो ॥

जाती की बेरियाँ कह्त गइलैं तोहै ना भुलाइब हो
रानी रखबै करेजवा की ओट पलकिया छिपाइब हो ॥

जनि रोआ अँखिया कै पुतरी तोहैं न बिसराइब हो
सखि चढ़तै फगुनवाँ कै मास बहुरि हम आइब हो ॥

हम नाहिं धनि निरमोहिया कि बिरहे जराइब हो
सखि सवने के मेघे तोहैं मघवा के जाड़ जुड़ाइब हो ॥

बहियाँ के पलना में झुर-झुर बेनियाँ डोलाइब हो
रानी तोरि निनिया सूतब जागब कल नहिं पाइब हो ॥

जय भारत बोला... दुसरका भाग

बाबूजी कऽ एगो कविता प्रस्तुत बा । ई हऽ दुसरी कड़ी । पहिली इहाँ पढ़ीं जा । जइसे-तइसे भोजपुरी लिख के गावै-बजावै वालन से अलग भोजपुरी, साहित्यिक संसकार में पगल भोजपुरी लिखे के हिमायती हउअँ हमार बाबूजी । आपन स्कूल खातिर बहुत लिखलन, ओही डायरी में लिखल कवितन में से इहाँ प्रस्तुत करत हईं । हमके तऽ एतने भोजपुरी लिखे में बहुते प्रयास करे के पड़ल हऽ, पूरा औघड़ हईं हम तऽ -
हुलसै ला पगवा पखार हो लहरिया क हार ले ले सगरा ॥
हिमकर हास दसन द्युति उडुगन,
मलयज बाजै सितार हो लहरिया क हार ले ले सगरा ।
सुर मणि मौलि मुकुट धवलागिरि
किंकिणि गंगा विहार हो लहरिया क हार ले ले सगरा ।
नरमद सिन्धु ललित अलकावलि
बिन्दी तिलक घनसार हो लहरिया क हार ले ले सगरा ।
द्राविण बंग तमिल अरु उत्कल
केरल चिरिया कै तार हो लहरिया क हार ले ले सगरा ।
* * *

सखि अग जग मन चोरवा हो मोर भारत देशवा ।
गौतम गाँधी कै सजल सपनवाँ
राना, सिवा, लछिमीबाई क प्रनवाँ,
नख शिख सुभग पोर-पोरवा हो मोर भारत देशवा ।
भगत, अजाद, तिलक, चितरंजन
इनिरा, जवाहिर कै नयना क अंजन,
नाचै निरखि मन मोरवा हो, मोर भारत देशवा ।
* * *

इन्नरपुर मदमथनी हमरी केसर कुंकुम नगरी
मोर कसमिरवा जागी ना ।
जननी माथै कै सिन्दुरवा, मोर कसमिरवा जागी ना ॥

कस्तूरी हिरनवाँ फनिहैं अम्बर ब्योम वितनवाँ
मोर कसमिरवा जागी ना ।
कवि गुरु कालीदास परनवाँ मोर कसमिरवा जागी ना ॥

जागी राजस्थनवाँ जागी कैकय सिन्धु सिवनवाँ
मोर कसमिरवा जागी ना ।
जागी सउँसै हिन्दुस्तनवाँ मोर कसमिरवा जागी ना ॥
* * *

जय भारत बोला सुगन मयना ।
जय भारत बोला सुगन मयना ॥

इहवाँ बदे तरसै इन्नर की नगरी
सपनों में तजबै न इहवाँ की डगरी ,
अब ’पंकिल’ खोला अलस नयना -
जय भारत बोला सुगन मयना॥

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